1320 MW कोयला‑आधारित बिजली के 25‑साल के करार को लेकर कांग्रेस‑भाजपा में तीखी टक्कर

उत्तराखंड सरकार ने 1320 मेगावाट कोयला‑आधारित बिजली के लिए 25 साल की दीर्घकालिक खरीद व्यवस्था को मंजूरी देते ही राजनीतिक मंच पर धूम मचा दी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा ने दिल्ली में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में धामी सरकार पर टेंडर प्रक्रिया में “86 में से 84 शर्तों” में बदलाव कर अदाणी पावर को फायदेमंद स्थिति बनाने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि मूल रूप से इस परियोजना को यूजेवीएन‑टीएचडीसी के संयुक्त उपक्रम के माध्यम से आगे बढ़ाने की योजना थी, परन्तु बाद में वह योजना रद्द कर निजी कंपनी को टेंडर के माध्यम से मौका दिया गया। खेड़ा ने यह भी सवाल उठाया कि टेंडर में बिजली उत्पादन संयंत्र को उत्तराखंड के बाहर स्थापित करने की अनुमति क्यों दी गई, जबकि ट्रांसमिशन और शिफ्टिंग का खर्च अंततः राज्य के उपभोक्ताओं पर ही आना पड़ेगा। कांग्रेस ने 25‑साल के पावर परचेज एग्रीमेंट के तहत लगभग 1.66 लाख करोड़ रुपये के संभावित भुगतान को लेकर गंभीर आशंकाएँ व्यक्त कीं।

इन आरोपों पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कठोर जवाब दिया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को ऊर्जा नीति पर सवाल उठाने से पहले अपने ही शासनकाल के फैसलों की समीक्षा करनी चाहिए। भट्ट ने 2016 में कांग्रेस के शासन में किए गए गैस पावर करार का हवाला देते हुए बताया कि वित्तीय वर्ष 2025‑26 में राज्य को गैस‑आधारित बिजली के लिए प्रति यूनिट 31.71 रुपये तक भुगतान करना पड़ा। इसके विपरीत, वर्तमान धामी सरकार ने कोयला‑आधारित 1320 MW की व्यवस्था लगभग 5.74 रुपये प्रति यूनिट की दर से 25 साल के लिए सुनिश्चित की है, जिससे ऊर्जा लागत में भारी अंतर स्पष्ट हो जाता है।

भट्ट ने यह भी रेखांकित किया कि कांग्रेस ने उत्तराखंड में अदाणी समूह के साथ पावर करार पर सवाल उठाते हुए, अपने शासित राज्यों में उसी समूह के साथ कई निवेश‑और‑ऊर्जा परियोजनाओं को मंजूरी दी है, जिससे उनके आरोपों की सच्चाई पर सवाल उठता है। उन्होंने कहा, “यदि कांग्रेस को इस मुद्दे पर विरोध का आधार चाहिए, तो उसे अपने ही रिकॉर्ड को साफ़ करना होगा।” अंत में भट्ट ने पुष्टि की कि यह 1320 MW की परियोजना उत्तराखंड में स्थापित नहीं होगी; न तो राज्य को जमीन देना पड़ेगा न ही किसी प्रकार का प्रदूषण भार उठाना पड़ेगा। उनका कहना है कि यह दीर्घकालिक व्यवस्था राज्य की बढ़ती बिजली माँग को स्थिर और सस्ती आपूर्ति के माध्यम से पूरा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

Original Title: 1320 MW बिजली करार पर कांग्रेस के भाजपा पर गंभीर आरोप, BJP ने दिया करारा जवाब

Original Content: उत्तराखंड में 1320 मेगावाट कोयला आधारित बिजली की 25 साल की दीर्घकालिक खरीद व्यवस्था को लेकर कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने आ गए हैं। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने दिल्ली में प्रेसवार्ता कर धामी सरकार पर टेंडर प्रक्रिया में बदलाव कर अदाणी पावर को फायदा पहुंचाने का आरोप लगाया। वहीं भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए सरकार के फैसले को राज्य की भविष्य की ऊर्जा जरूरतों से जोड़ा।

कांग्रेस ने धामी सरकार पर लगाए गंभीर आरोप

कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने धामी सरकार पर आरोप लगाया कि 1320 मेगावाट बिजली की खरीद के लिए जारी टेंडर की 86 में से 84 शर्तों में बदलाव किए गए, जिससे अदाणी पावर को फायदा पहुंचाने का रास्ता तैयार हुआ। कांग्रेस का दावा है कि पहले UJVN-THDC के संयुक्त उपक्रम के जरिए परियोजना आगे बढ़ाने की योजना थी, लेकिन बाद में इसे खत्म कर टेंडर प्रक्रिया के जरिए निजी कंपनी को मौका दिया गया।

खेड़ा ने यह भी सवाल उठाया कि टेंडर में बिजली उत्पादन संयंत्र को उत्तराखंड से बाहर स्थापित करने की अनुमति क्यों दी गई और इसकी शिफ्टिंग व ट्रांसमिशन का खर्च राज्य के उपभोक्ताओं पर क्यों आएगा। कांग्रेस ने 25 साल के पावर परचेज एग्रीमेंट और करीब 1.66 लाख करोड़ के संभावित भुगतान को लेकर भी सवाल उठाए हैं।

भट्ट ने दिया कांग्रेस को करारा जवाब

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन खेड़ा को करारा जवाब देते हुए कहा कि कांग्रेस को ऊर्जा क्षेत्र पर सवाल उठाने से पहले अपने शासनकाल के फैसलों का हिसाब देना चाहिए। भट्ट ने कहा कि कांग्रेस शासन में वर्ष 2016 में किए गए गैस पावर करार के कारण वित्तीय वर्ष 2025-26 में राज्य को गैस आधारित बिजली के लिए 31.71 रुपए प्रति यूनिट तक भुगतान करना पड़ा। इसके विपरीत वर्तमान सरकार ने 1320 मेगावाट कोयला आधारित बिजली की दीर्घकालिक व्यवस्था लगभग 5.74 रुपए प्रति यूनिट की दर से 25 सालों के लिए सुनिश्चित की है।

भट्ट ने कहा कि दोनों दरों की तुलना खुद बताती है कि वर्तमान सरकार राज्य की ऊर्जा सुरक्षा और उपभोक्ताओं के हितों को लेकर किस दिशा में काम कर रही है। उन्होंने कांग्रेस के आरोपों पर सवाल उठाते हुए कहा कि एक ओर कांग्रेस उत्तराखंड में अदाणी समूह से जुड़े पावर करार पर सवाल उठा रही है, वहीं कांग्रेस शासित राज्यों में उसी समूह के साथ विभिन्न क्षेत्रों में निवेश और ऊर्जा परियोजनाओं को लेकर करार किए गए हैं। ऐसे में उत्तराखंड में इसी विषय को लेकर विरोध का आधार कांग्रेस को स्पष्ट करना चाहिए।

राज्य पर जमीन और प्रदूषण का बोझ नहीं: भट्ट

महेंद्र भट्ट ने कहा कि 1320 मेगावाट की यह परियोजना उत्तराखंड में स्थापित नहीं हो रही है। राज्य को इसके लिए न अपनी जमीन देनी है और न ही यहां परियोजना से जुड़ा प्रदूषण भार आएगा। राज्य का उद्देश्य भविष्य की बढ़ती बिजली मांग के लिए दीर्घकालिक और स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की ऊर्जा जरूरत आने वाले वर्षों में तेजी से बढ़ने वाली है। ऐसे में 25 सालों के लिए बिजली की दीर्घकालिक व्यवस्था राज्य की ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
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