हरिद्वार का अटूट किला: कांग्रेस को क्या चुनौती मिल सकती है?

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उत्तराखंड के धार्मिक और आध्यात्मिक केंद्र हरिद्वार का शहर-सभा क्षेत्र, राज्य की सबसे प्रतिष्ठित और हाई‑प्रोफाइल सीटों में से एक है। 2002 में राज्य के गठन के बाद से यह सीट भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राजनीति का प्रतीक बनकर उभरी है। वर्तमान कैबिनेट मंत्री और पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक ने 2002 से लेकर 2022 तक पाँच लगातार चुनावों में जीत दर्ज कर इस सीट को “अभेद्य किला” बना दिया है।

पहला 2002 चुनाव, जब कौशिक ने अपनी पहली जीत हासिल की, ने भाजपा को उत्तराखंड में मजबूत उपस्थिति दिलाई। 2007 के चुनाव में उन्होंने समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता अंबरीश कुमार को बड़े अंतर से हराया। 2012 में, कौशिक ने कांग्रेस प्रत्याशी सतपाल ब्रह्मचारी को लगभग 8,600 वोटों के अंतर से पराजित किया। मोदी युग के प्रचंड प्रभाव के साथ 2017 के विधानसभा चुनाव में कौशिक ने जयराम आश्रम के प्रमुख ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी को 35,900 से अधिक वोटों के रिकॉर्ड अंतर से मात दी। 2022 में अंतर कम हुआ, फिर भी कौशिक ने सतपाल ब्रह्मचारी को 15,237 वोटों से हराकर पाँचवीं जीत सुनिश्चित की। इस बार, प्रदेश में जारी वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) के कारण 19,713 वोट कटे हैं, जो कि जीत के अंतर से भी अधिक हैं और कौशिक के लिए नई चुनौती पैदा करते हैं।

हरिद्वार का चुनावी परिदृश्य ग्रामीण सीटों से काफी अलग है। यहाँ का मतदाता वर्ग शहरी और धार्मिक रूप से गहराई से जुड़ा हुआ है: तीर्थ पुरोहित, स्थानीय व्यापारी, गंगा सभा के सदस्य और उच्च‑मध्यम वर्ग प्रमुख रूप से भाजपा के साथ जुड़े हैं। ब्राह्मण, वैश्य और पंजाबी‑पहाड़ी समुदायों की बड़ी संख्या इस सीट पर निर्णायक भूमिका निभाती है। संतों और आश्रमों का समर्थन चुनावी नतीजों पर गहरा असर डालता है, जबकि मुस्लिम व दलित मतदाता कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक का हिस्सा हैं, परन्तु उनकी संख्या जीत के आंकड़े तक पहुँचने के लिए अपर्याप्त है।

कौशिक के अजेय रिकॉर्ड के बावजूद भाजपा के भीतर टिकट के दावेदारों के बीच अंदरूनी सुगबुगाहट जारी है। सीएम धामी के प्रतिद्वंद्वी त्रिवेंद्र रावत गुट के करीबी माने जाने के कारण कौशिक को कैबिनेट में लिया गया, परंतु उसे पहले जैसा महत्व नहीं दिया गया। पूर्व मेयर व मनोज गर्ग, आदेश सैनी, आशुतोष शर्मा और अन्य ओबीसी‑ब्राह्मण वर्ग के युवा नेता भी टिकट के लिए दावेदारी कर रहे हैं। भाजपा के लिए सबसे बड़ा धर्मसंकट यह तय करना है कि क्या वह पाँच बार के विधायक पर भरोसा जताएगी या “सत्ता विरोधी लहर” को बेअसर करने के लिए नया चेहरा मैदान में उतारेगी।

कांग्रेस इस सीट पर लगातार हार के सिलसिले को तोड़ने के लिए संत समाज और सवर्ण (ब्राह्मण‑वैश्य) वोट बैंक में सेंध लगाने वाले चेहरे को आगे करने की योजना बना रही है। 2012 और 2022 में प्रत्याशी रहे पूर्व मेयर व धर्मगुरु सतपाल ब्रह्मचारी, जो वर्तमान में हरियाणा की सोनीपत लोकसभा सीट से सांसद हैं, को नहीं चुनेंगे, परन्तु जयराम आश्रम के पीठाधीश्वर व 2017 में प्रत्याशी रहे ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी को दांव पर लगा सकती हैं। साथ ही, पूर्व मेयर अनीता शर्मा, महिला/व्यापारी वर्ग के दम पर और वरिष्ठ नेता संजय पालीवाल, संगठनात्मक कैडर के भरोसे टिकटार्थी बन सकते हैं। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी की अंदरूनी गुटबाज़ी को समाप्त करना और पारंपरिक दलित‑अल्पसंख्यक वोटों के साथ-साथ वैश्य‑ब्राह्मण मतदाताओं का विश्वास हासिल करना है। 2027 के चुनाव में कांग्रेस कौन सा दांव खेलकर मदन कौशिक के सामने बड़ी चुनौती खड़ी करेगी, यह देखने को मिलेगा।

**Original Title: ** 5 चुनाव, 5 जीत… क्या कांग्रेस इस बार भेद पाएगी मदन कौशिक का अभेद्य किला?

**Original Content: ** उत्तराखंड का हरिद्वार (शहर) विधानसभा क्षेत्र राज्य की सबसे हाई-प्रोफाइल और प्रतिष्ठित सीटों में शुमार है। यह सीट भाजपा और कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक का एक ऐसा गढ़ है जिसे भेदना कांग्रेस के लिए हमेशा से एक कड़ी चुनौती रहा है। आगामी विधानसभा चुनाव में जहां भाजपा को अपने लंबे शासन से उपजी नाराजगी और नए चेहरों की आकांक्षाओं को साधना होगा, वहीं कांग्रेस को अपनी अंदरूनी गुटबाजी से ऊपर उठकर एक सर्वसम्मत और प्रभावशाली चेहरे पर दांव लगाना होगा। …