नैनीताल के ज्योलीकोट में पानी‑जनित स्वास्थ्य आपदा: 250 से अधिक रोगी, 2 की मौत

नैनीताल जिले के ज्योलीकोट क्षेत्र में दूषित पानी की समस्या ने पिछले तीन महीनों से लगातार बढ़ते स्वास्थ्य संकट को जन्म दिया है। पीलिया, टायफाइड और डायरिया के मामलों में वृद्धि के साथ, अब तक 250 से अधिक लोग बीमार हो चुके हैं और दो लोगों की जान चली गई है। ग्रामीणों की शिकायतें अनसुनी रहीं, जिससे स्थिति और भी गंभीर हो गई है।

रितेश जीना, 16 वर्ष के एक निवासी, उल्टी, दस्त और बुखार के बाद हल्द्वानी से दिल्ली भेजे गए। वहाँ राम मनोहर लोहिया अस्पताल में डॉक्टरों ने लिवर ट्रांसप्लांट की सलाह दी, जिसकी लागत लगभग एक करोड़ रुपये होने का अनुमान था। दुर्भाग्यवश, इलाज के दौरान रितेश की मृत्यु हो गई। इसी तरह, नीमा जोशी, जो क्षेत्र में दूषित पानी की समस्या को लेकर सक्रिय रूप से कार्यरत थीं, बुखार के बाद लिवर संक्रमण और पीलिया के निदान के बाद बरेली के राममूर्ति अस्पताल में भर्ती हुईं, परंतु इलाज के दौरान उनकी भी मृत्यु हो गई। दोनों मामलों ने ग्रामीणों में गहरी चिंता और आक्रोश का माहौल पैदा कर दिया।

ग्रामीणों का दावा है कि पानी को छानने के बावजूद उसमें मलबा और संदूषक दिखाई देते हैं। उन्होंने जल स्रोत और सप्लाई लाइन की जांच कराने की मांग की है, यह कहते हुए कि जब तक दूषित पानी का वास्तविक कारण पता नहीं चलेगा, तब तक बीमारी का खतरा बना रहेगा। ब्लॉक प्रमुख हरीश बिष्ट के अनुसार, जल संस्थान और स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों ने पानी के स्रोतों का निरीक्षण किया है और संदिग्ध स्रोतों को बदलने का प्रयास किया है। पानी के स्रोतों और वाटर टैंकों में क्लोरीनेशन भी कराया गया, लेकिन समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।

नैनीताल के सीएमओ डॉ. रश्मि पंत ने ग्रामीणों को आश्वासन दिया कि घबराने की ज़रूरत नहीं है। उन्होंने बताया कि ज्योलीकोट पीएचसी में चार अतिरिक्त बेड जोड़ दिए गए हैं और डॉक्टरों की संख्या व ड्यूटी भी बढ़ाई गई है। सीएमओ ने लोगों से पानी को उबालकर पीने की अपील की, खुले स्रोत का पानी न पीने और कटे हुए फल‑सब्जियों से बचने की सलाह दी। ग्रामीण जल संस्थान और स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते हुए, प्रशासन ने क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ाने और दूषित पानी के स्रोत का पता लगाने के लिए जांच जारी रखने का वादा किया है।