नेपाल में बाढ़ के बाद जो तबाही हुई, वह सबको चौंका गई। लाखों ज़िंदगियाँ पानी में डूब गईं, और नेपाल से भेजी जा रही तस्वीरें अभी भी लोगों के दिलों में गूँज रही हैं। इसी के बीच, वैज्ञानिकों ने उत्तराखंड के लिए भी समान चेतावनी जारी की है। उनका कहना है कि यदि हम समय पर कदम नहीं उठाते, तो नेपाल जैसी आपदा हमारे राज्य में भी आ सकती है।
**उत्तराखंड का आपदाओं से पुराना इतिहास**
उत्तराखंड में हर वर्ष बाढ़, भूस्खलन, सड़क ढहना और नदी के उफान जैसी घटनाएँ होती रही हैं। केदारनाथ, धराली और अन्य पहाड़ी इलाकों में मानसून के दौरान अक्सर भारी बारिश से नदियाँ फट जाती हैं, जिससे सड़कें और मार्ग प्रभावित होते हैं।
**नया खतरा – ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF)**
इस बार का खतरा सामान्य मानसून या भूस्खलन से अलग है। वैज्ञानिकों ने हिमालय में तेज़ी से बदलते मौसम और पिघलते ग्लेशियरों के कारण ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड के बढ़ते जोखिम पर प्रकाश डाला है।
**ग्लेशियर पिघलने के कारण**
उच्च हिमालयी इलाकों में मानव गतिविधियाँ बढ़ती जा रही हैं। सड़कें, पर्यटन और धार्मिक यात्रा में वृद्धि के साथ-साथ सड़क, भवन और बिजली परियोजनाएँ भी चल रही हैं। इन सभी गतिविधियों ने ग्लेशियरों के पिघलने में योगदान दिया है।
**नई झीलें और कमजोर प्राकृतिक बाँध**
ग्लेशियरों के पिघलने से पानी जमा होकर नई झीलें बनती हैं। इन झीलों के आसपास के प्राकृतिक बाँध अक्सर कमजोर होते हैं। जब ये बाँध टूटते हैं, तो ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड की स्थिति पैदा हो सकती है। इस स्थिति में झील का पानी तेज़ी से नीचे की ओर बहता है, साथ में बड़े बोल्डर और मलबे लेकर, रास्ते में आने वाली हर चीज़ को निगल जाता है।
**उत्तराखंड में भी संभावित बड़ी आपदा**
वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लेशियरों में हो रहे ये परिवर्तन सामान्य नहीं हैं और इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि समय पर ग्लेशियल लेकस की निगरानी और प्रबंधन नहीं किया गया, तथा उच्च हिमालयी इलाकों में एर्ली वार्निंग सिस्टम जैसी सुविधाएँ विकसित नहीं हुईं, तो उत्तराखंड में भी नेपाल जैसी बड़ी आपदा का खतरा बढ़ सकता है।
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