लोकजीवन का ‘रैमासी फूल’, जटामासी के मोहक फूल हैं?

लोकजीवन का ‘रैमासी फूल’, जटामासी के मोहक फूल हैं?
ख़बर शेयर करे :
Stay connected via Google News
Follow us for the latest updates and guides.
Add as preferred source on Google

The post लोकजीवन का ‘रैमासी फूल’, जटामासी के मोहक फूल हैं? appeared first on Avikal Uttarakhand.

डॉ विक्रम सिंह बर्त्वाल की कलम से

20 अगस्त 2026 को हिमवंत कवि चंद्र कुंवर बर्त्वाल की 108 वीं जयंती के अवसर पर 'द हिल्स आफ मसूरी'न्यूज़ पोर्टल के संपादक और चंद्र कुंवर बर्त्वाल को शोध संस्थान मसूरी के अध्यक्ष शूरवीर सिंह भंडारी जी से दूरभाष पर बात हुई। कुछ बातें हिमवंत कवि चंद्र कुंवर बर्त्वाल  की जयंती कार्यक्रमों पर एवं कुछ उनकी कविताओं को लेकर हुई। 

अचानक चर्चा के दौरान कविवर बर्त्वाल की रैमासी के फूल कविता का प्रसंग आया। भंडारी जी ने मुझे बताया कि उनके किसी सुधी मित्र ने बताया कि चंद्र कुंवर बर्त्वाल की कविताओं में वर्णित रैमासी के फूल का जो प्रसंग आया है वह पुष्प कहीं भी अस्तित्व में नहीं था, उनके इस वक्तव्य से थोड़ा में चिंतन की मुद्रा में आ गया।
मैंने भंडारी जी से कहा कि मैं इस बारे में कल तक कुछ जानकारी जुटाकर बात करूंगा। मेरे मस्तिष्क में एक बात चल रही थी कि आखिर हिमवंत कवि चंद्र कुंवर बर्त्वाल की कविताओं में वर्णित पुष्प उपमा के रूप में प्रस्तुत कोई फूल तो नहीं? फिर द्वंद बढा कि यह कविता ही नहीं लोकगीतों में भी वर्णित है,और लोक में वर्णित एवं लोक कंठों में गुंजित बात काल्पनिक नहीं हो सकती।

चिंतन की इसी अवस्था में कविवर बर्त्वाल की ये पंक्तियां मेरे मस्तिष्क में आकार लेने लगी-
कैलाशों पर उगते ऊपर,
रैमासी के दिव्य फूल।
मां गिरिजा दिन भर चुन,
जिनसे भरती अपना दुकूल
मैं, रैमासी शब्द को विच्छेदन के साथ समझने का प्रयास करने लगा । व्याकरणीय दृष्टिकोण से “रैमासी”शब्द का विच्छेदन करने पर रै+मासी शब्द मिलते हैं। जिसमें “रै” अथवा राय का अर्थ राजा, शाही अथवा श्रेष्ठ से होता है। जबकि मासी शब्द संस्कृत शब्द मांसी का अपभ्रंश है। वनस्पति विज्ञान और आयुर्वेद में “मांसी” का अर्थ “जटामासी” से है। इस प्रकार “रैमासी” का अर्थ ‘श्रेष्ठ जटामासी,से है। हिमालय की इस जड़ी-बूटी के फूलों का सौंदर्य, इसकी तीक्ष्ण और मनमोहक सुगंध एवं औषधीय गुणों के कारण शायद कवि ने ‘मासी’ शब्द पर ” रै”उपसर्ग लगाया गया हो जिससे इस दिव्य गुणों से परिपूर्ण बूटी और इसके फूलों की विशेषता का सहज ही ज्ञान हो सके।

हिमवंत कवि चंद्र कुंवर बर्त्वाल की ‘ रैमासी के फूल’कविता पर पर जब मैंने प्रसिद्ध वनस्पति शास्त्री एवं उच्च शिक्षा उत्तराखंड से प्राचार्य पद से सेवानिवृत प्रोफेसर गोविंद सिंह रजवार से पूछा तो उन्होंने भी माना कि कवि द्वारा वर्णित फूल जटामांसी के ही हैं,उन्होंने कहा कि इस जड़ी- बूटी का अंग्रेजी नाम ‘स्पाईकनार्ड’ तथा वानस्पतिक नाम ‘नार्डोस्टैचिस जटामांसी’ है उन्होंने कहा कि यह उच्च हिमालय क्षेत्र में पाया जाने वाला एक औषधीय पौधा है।

उत्तराखंडी संस्कृति के ज्ञानकोष प्रोफेसर डी आर पुरोहित कहते हैं कि लोकगीतों और लोक में रचा बसा रैमासी का फूल अस्तित्वहीन कैसे हो सकता है? साहित्य और औच्चारणिक दृष्टि से थोड़ा नामों में अंतर हो सकता है, उन्होंने भी इसके जटामांसी के पुष्प होने की बात कही है।
उत्तराखंड सेवा निधि अल्मोड़ा के सहयोग से मालचंद रमोला द्वारा वर्ष 1994 में प्रकाशित गढ़वाली- हिंदी शब्दकोश के पृष्ठ 193 पर रैमासी को एक फूल का नाम बताया गया है।

उपरोक्त तथ्यों तथा मतों से हिमवंत कवि चंद्र कुंवर बर्त्वाल की कविताओं के रैमासी का फूल का अस्तित्व साबित होता है। यह मांसी अर्थात जटामासी का ही फूल है।

यदि यह जटामासी नहीं है तो 20वीं सदी के चौथे दशक तक इस प्रजाति का अस्तित्व रहा होगा, जो कि ‘पुरावनस्पति विज्ञानियों’को खोजने के लिए प्रेरित करता है।

कवि के रैमासी के दिव्य फूल पर दिव्य दृष्टि की दरकार है।

The post लोकजीवन का ‘रैमासी फूल’, जटामासी के मोहक फूल हैं? appeared first on Avikal Uttarakhand.

Stay connected via Google News
Follow us for the latest updates and guides.
Add as preferred source on Google
×